
accha khao accha dikho

@Sanjay
एक भयानक चोट ने मेरे कुश्ती के सपने तोड़ दिए थे। लेकिन मैंने ईंटों और बाल्टियों से खुद को दोबारा गढ़ा। अब मैं उन देसी युवाओं का कोच हूँ जो महंगे जिम नहीं जा सकते।

accha khao accha dikho

work and coffee !!
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जय बजरंग बली! कैसे हो मेरे शेरों? मुझे स्क्रीन पर देखकर या मेरी आवाज़ सुनकर ही तुम्हारे अंदर का खून खौलने लगता होगा, है ना? तुम लोग मुझे रोज़ सुबह 5 बजे मिट्टी में डंड-बैठक लगाते, गेहूं की बोरियां उठाते और कैमरे में चीख-चीख कर तुम्हें बिस्तर से उठने के लिए मोटिवेट करते हुए देखते हो। मेरी वीडियो देखकर बहुत से लोग कहते हैं, "अरे यार, इस बंदे में इतनी एनर्जी कहां से आती है? ये कभी थकता नहीं है क्या?" भाई, जो इंसान ज़िंदगी के सबसे गहरे और अंधेरे कुएं से बाहर निकल कर आया हो ना, उसे थकने का हक ही नहीं होता! आज तुम्हारे इस 'देसी भाई' की वो कहानी सुनो, जो मैंने कभी अपने वर्कआउट व्लॉग्स में नहीं बताई। मेरी कहानी किसी फाइव-स्टार जिम से शुरू नहीं हुई थी, मेरी कहानी शुरू हुई थी मेरे गांव के उस अखाड़े से, जहां मिट्टी को माथे पर लगाकर दिन की शुरुआत होती थी। बचपन से मेरा सिर्फ एक ही सपना था—स्टेट-लेवल कुश्ती (Wrestling) में गोल्ड मेडल जीतना और अपने परिवार का नाम रोशन करना। मेरे पिताजी किसान थे, घर में पैसे की हमेशा तंगी रहती थी, लेकिन मेरे दूध, बादाम और देसी घी में उन्होंने कभी कोई कमी नहीं आने दी। मैं सुबह 4 बजे उठता, मीलों दौड़ लगाता, और दिन-रात अखाड़े में पसीना बहाता था। मेरा शरीर लोहे की तरह मजबूत हो चुका था। आस-पास के गांवों में मेरे नाम का डंका बजने लगा था। सब कहते थे, "संजय तो इस बार दंगल मार के ही लाएगा।" लेकिन भाई, ऊपर वाले ने मेरे लिए कुछ और ही स्क्रिप्ट लिख रखी थी। स्टेट चैंपियनशिप से ठीक एक महीना पहले, एक लोकल मैच के दौरान मेरा दायां घुटना बुरी तरह ट्विस्ट हो गया। ऐसी आवाज़ आई जैसे कोई सूखी लकड़ी बीच से टूट गई हो। मैं वहीं मिट्टी में गिरकर तड़पने लगा। जब डॉक्टर के पास ले गए, तो उसने जो बात कही, वो मेरी ज़िंदगी का सबसे बड़ा झटका था। डॉक्टर ने मेरी एमआरआई (MRI) रिपोर्ट देखकर सीधा बोल दिया, "संजय, तुम्हारे घुटने के लिगामेंट्स (Ligaments) पूरी तरह फट चुके हैं। तुम अब कभी कुश्ती नहीं लड़ पाओगे। दौड़ना तो दूर, तुम्हें ठीक से चलने में भी महीनों लग जाएंगे।" वो दिन था, और मेरे अंदर का वो पहलवान हमेशा के लिए मर गया। मेरे सपने, मेरी सालों की मेहनत, मेरे पिताजी का पैसा... सब उस एक पल में मिट्टी में मिल गया। सर्जरी के बाद मैं 6 महीने तक बिस्तर पर पड़ा रहा। जो लड़का दिन में 1000 डंड-बैठक मारता था, वो अब खुद उठकर बाथरूम भी नहीं जा सकता था। वो फेज़ (Phase) मेरी ज़िंदगी का सबसे काला और भयानक दौर था। कुश्ती छूटने के गम और दिन भर बिस्तर पर पड़े रहने की वजह से मेरा वजन तेज़ी से बढ़ने लगा। मैंने खुद को कमरे में कैद कर लिया था। जो रिश्तेदार और दोस्त कल तक मेरी मिसालें देते थे, वो अब पीठ पीछे ताने मारने लगे। "अरे पहलवान जी की तो हवा निकल गई," "अब क्या करेगा ये, जिंदगी भर बाप के टुकड़ों पर पलेगा।" ये बातें मेरे कानों तक पहुँचती थीं और मुझे अंदर ही अंदर खोखला कर रही थीं। मेरा वजन 110 किलो पार कर चुका था। डिप्रेशन इतना हावी हो गया था कि मैंने शीशा देखना बंद कर दिया था। मुझे खुद से नफरत होने लगी थी। एक दिन मेरी मां मेरे कमरे में आई। वो मुझे खाना देने आई थी। मैंने देखा कि वो मुझे देखकर अपनी आंखें पोछ रही थीं। उनकी वो आंसू भरी आंखें देखकर मेरे अंदर जैसे करंट सा दौड़ गया। मैंने खुद से कहा, "संजय, तू एक पहलवान है। अखाड़े में गिरना हार नहीं होती, लेकिन गिरकर ना उठना कायरता होती है। तेरा घुटना टूटा है, तेरी हिम्मत नहीं!" उसी दिन मैंने तय किया कि मैं वापसी करूंगा। कुश्ती के अखाड़े में नहीं, तो ज़िंदगी के अखाड़े में सही। लेकिन मेरे पास महंगे रिहैब (Rehab) सेंटर या फैंसी जिम जाने के पैसे नहीं थे। घर की हालत पहले ही मेरी सर्जरी में खराब हो चुकी थी। तब मैंने अपने घर के आंगन को ही अपना जिम बना लिया। शुरुआत बहुत दर्दनाक थी। जब मैं पहली बार बिना सहारे के चला, तो आंखों से आंसू आ गए थे। मैंने आस-पास पड़ी ईंटों (Bricks) को डंबल बना लिया। पानी से भरी बाल्टियों से शोल्डर और बाइसेप्स की ट्रेनिंग शुरू की। भारी पत्थरों और सीमेंट के कट्टों से स्क्वाट्स (Squats) करना शुरू किया। दर्द से चीख निकल जाती थी, घुटना जवाब दे देता था, लेकिन मैंने रुकना छोड़ दिया था। 1 साल की जी-तोड़, पागलों वाली मेहनत के बाद, मैंने अपना 35 किलो वजन कम किया और पहले से भी ज्यादा तगड़ी और फिट बॉडी बना ली। जब मोहल्ले के लड़कों ने मेरा ये ट्रांसफॉर्मेशन (Transformation) देखा, तो वो मेरे पास आने लगे। "भैया, हमें भी बॉडी बनानी है, लेकिन जिम के पैसे नहीं हैं।" मुझे समझ में आ गया कि इस देश में फिटनेस को कितना कमर्शियलाइज (Commercialize) कर दिया गया है। लोगों को लगता है कि बिना महंगे प्रोटीन पाउडर और एसी वाले जिम के बॉडी बन ही नहीं सकती। मैंने फैसला किया कि मैं इस झूठ को तोड़कर रहूंगा। मैंने अपना फोन उठाया और अपने उसी देसी वर्कआउट की वीडियो बनानी शुरू कर दी। मैं वीडियो में चीखता था, "उठ जा भाई! क्या बिस्तर में पड़ा है? बाहर आ, ईंट उठा और शुरू हो जा!" मेरा वो देसी, आक्रामक और सच्चा अंदाज़ लोगों को बहुत पसंद आया। जो लड़के महंगे जिम नहीं जा सकते थे, वो मुझे अपना गुरु मानने लगे। वीडियो वायरल होने लगे, और लाखों लोग मेरे साथ जुड़ गए। लेकिन भाई, असली लड़ाई तो अब शुरू होने वाली थी। जब मेरे फॉलोवर्स बढ़े, तो मुझे लगा कि अब शायद मैं इससे पैसे कमाकर अपने परिवार की मदद कर पाऊंगा और अपने अखाड़े के बच्चों के लिए कुछ सामान ला पाऊंगा। लेकिन जो पुराने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स थे, उनका सिस्टम बहुत ही सड़ा हुआ था। उनकी ऐल्गोरिदम (Algorithm) को मेरी देसी फिटनेस से कोई मतलब नहीं था। वो उन 'जिम ब्रोस' को प्रमोट करते थे जो महंगे कपड़े पहनकर, जिम के शीशे के सामने एब्स दिखाते थे। मैं महीनों तक वीडियो बनाता रहा, लाखों व्यूज आते रहे, लेकिन कमाई के नाम पर मुझे मूंगफली के दाने मिलते थे। प्लेटफॉर्म्स सारा पैसा खुद रख लेते थे। मुझे लगने लगा कि क्या मैं ज़िंदगी भर फ्री में ही गधा-मज़दूरी करता रहूंगा? तभी मेरी नज़र 'vTogether' पर पड़ी। जब मैंने पढ़ा कि ये प्लेटफॉर्म क्रिएटर्स को 95% रेवेन्यू (Revenue) देता है, तो मुझे विश्वास ही नहीं हुआ। मैंने सोचा, "भाई, ये तो हमारे मतलब की चीज़ है!" मैंने अपनी पूरी देसी आर्मी को vTogether पर बुला लिया। vTogether पर आने के बाद मेरी ज़िंदगी ही बदल गई। यहाँ मुझे ऐल्गोरिदम की गुलामी नहीं करनी पड़ती। यहाँ की कम्युनिटी मेरे जैसे रियल और देसी कंटेंट की इज़्ज़त करती है। मैं यहाँ सुबह-सुबह लाइव आकर हज़ारों बच्चों के साथ एक साथ 'लाइव वर्कआउट' करता हूँ। इस प्लैटफॉर्म के 95/5 रेवेन्यू मॉडल की वजह से मुझे जो आर्थिक आज़ादी मिली है, उससे मैंने ना सिर्फ अपने परिवार की आर्थिक तंगी दूर की है, बल्कि अपने गांव में एक शानदार अखाड़ा भी बनवाया है जहाँ आज 50 से ज्यादा गरीब बच्चे मुफ्त में ट्रेनिंग करते हैं। आज तुम्हारा ये भाई सिर्फ एक फिटनेस कोच नहीं है, बल्कि एक पूरी कम्युनिटी का लीडर है। मेरा मकसद सिर्फ डोले-शोले बनाना नहीं है, मेरा मकसद युवाओं के दिमाग में वो फौलाद भरना है कि ज़िंदगी तुम्हें कितनी भी ज़ोर से ज़मीन पर पटके, तुम्हें वापस बाउंस बैक (Bounce back) करना आना चाहिए। अगर तुम्हारे पास पैसे नहीं हैं, मशीनें नहीं हैं, तो बहाने बनाना छोड़ो। तुम्हारी अपनी बॉडी ही सबसे बड़ी मशीन है। बस सीने में आग होनी चाहिए। तो चलो, फोन रखो और मारो 50 पुशअप्स! रुकना नहीं है! जय हिंद!